जंगल बना जान का खतरा: बारनवापारा क्षेत्र में वन्यप्राणी गौर के हमले से दहशत, एक दिन में तीन लोग शिकार।
जानकारी के अनुसार, 19 मई 2026 की सुबह लगभग 8:30 बजे ग्राम गजराडीह निवासी देवेंद्र साहू (51 वर्ष) पिता स्व. पांडव साहू, जाति कोलता, वन कक्ष क्रमांक 117 में तेंदूपत्ता तोड़ रहे थे। इसी दौरान अचानक वन्यप्राणी गौर ने उन पर सींग से हमला कर दिया। हमला इतना आक्रामक था कि वे गंभीर रूप से घायल हो गए। तत्काल उन्हें उपचार के लिए सोहम हॉस्पिटल महासमुंद ले जाया गया, लेकिन कुछ समय बाद उनकी मौत हो गई। घटना के बाद वन विभाग द्वारा तात्कालिक सहायता राशि 5000 रुपये प्रदान की गई।
इसी तरह, सुबह लगभग 9 बजे ग्राम रवान निवासी गायत्री यादव (60 वर्ष) पति मंगतू यादव पर वन कक्ष क्रमांक 118 में गौर ने हमला कर घायल कर दिया। घायल अवस्था में उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तुमगांव पहुंचाया गया, जहां उनका उपचार जारी है। वन विभाग द्वारा पीड़िता को 1000 रुपये की तात्कालिक सहायता राशि दी गई।
वहीं, मुरुमडीह निवासी पंचबाई ठाकुर (37 वर्ष) पति स्व. दुलार सिंह, जाति गोंड, पर भी सुबह लगभग 8 बजे वन कक्ष क्रमांक 121 में तेंदूपत्ता तोड़ने के दौरान गौर ने सींग से हमला कर दिया। हमले में घायल पंचबाई ठाकुर को भी उपचार के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तुमगांव ले जाया गया, जहां उनका इलाज जारी है। विभाग द्वारा उन्हें भी 1000 रुपये की सहायता राशि उपलब्ध कराई गई।
क्षेत्र में दहशत, ग्रामीणों में बढ़ा भय
एक ही दिन में अलग-अलग स्थानों पर तीन लोगों पर गौर के हमले ने रवान, गजराडीह और मुरुमडीह क्षेत्र में सनसनी फैला दी है। ग्रामीणों में डर का माहौल है, क्योंकि यह हमला ऐसे समय हुआ जब बड़ी संख्या में लोग जंगलों में तेंदूपत्ता संग्रहण के लिए पहुंच रहे हैं।
बारनवापारा अभ्यारण्य क्षेत्र में वन्यप्राणियों की संख्या लगातार बढ़ने की खबरें सामने आती रही हैं। बीते कुछ वर्षों से जंगलों में बाघ की मौजूदगी और उसकी चहलकदमी की सूचनाएं भी मिलती रही हैं, जिससे ग्रामीण पहले से ही सहमे हुए हैं। हालांकि अब तक बाघ के हमले से किसी ग्रामीण के प्रभावित होने का मामला सामने नहीं आया है, लेकिन गौर के लगातार बढ़ते हमले चिंता का विषय बनते जा रहे हैं।
जंगल ही जीवन, जंगल ही दुनिया
क्षेत्र के हजारों ग्रामीण एवं वनवासी परिवारों का जीवन-यापन मुख्य रूप से तेंदूपत्ता, महुआ, चार, गोंद एवं अन्य वनोपज संग्रहण पर निर्भर है। ऐसे में वन्यप्राणियों के खतरे के बावजूद ग्रामीणों को जंगल जाना मजबूरी बन जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि “डर तो है, लेकिन पेट पालने के लिए जंगल जाना ही पड़ता है। जंगल ही हमारा जीवन है और जंगल ही हमारी दुनिया।”
घटना के बाद ग्रामीणों ने वन विभाग से सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने, निगरानी तेज करने तथा तेंदूपत्ता संग्रहण क्षेत्रों में वन्यप्राणियों की गतिविधियों पर नजर रखने की मांग की है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।
